बहुत उकता चुके हैं हम ख़ुशी से

बहुत उकता चुके हैं हम ख़ुशी से
चलो  मिलते  हैं अब नाराज़गी से

उदासी का सबब उनसे जो पूछा
हिलाया सर  बड़ी  ही सादगी से 

हमें   इंसान   क्यूँ   कहते  नहीं हैं
चलो   पूंछें  ये  पंडित  मौलवी  से 

लिपट कर मुफ़लिसी की चादरों में
निकलती  है  गरीबी  हर  गली  से 

दिला मुझको यकीं अपनी ख़ुशी का
मैं  दुनिया  छोड़  दूँ  अपनी  ख़ुशी से 

दिखा   दे   यार   मेरे   मुस्कराकर
घुटा   जाता   है  दम  संज़ीदगी  से 

हम अपनी मौत को ठुकरा चुके है
हमारा  कौल  है  कुछ  ज़िंदगी  से 

अज़ाब  ऐसे  भी  देखे हैं  कि आँखें
जला  देती  हैं  घर  अपनी  नमी से 

लिए  फिरता  है  जो  ईमां कि गठरी
नहीं  टूटा  है  क्या  फ़ाक़ाकशी  से 

मुझे  जाना  है  इक  लंबे  सफ़र  पर
इजाज़त  चाहता  हूँ  हर  किसी  से

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