भरते रहे थे आह जो जज़्बात रात भर

भरते रहे थे आह जो जज़्बात रात भर
करते रहे हम उनकी मुदावात रात भर

उम्मीद के  चिराग़  ने  यूँ  हौसला दिया
सूरज  का  इंतज़ार किया रात रात भर

यूँ तो कभी दिखाई नहीं जुगनुओं ने राह
तरसे उन्ही को  ऐसे थे हालात रात भर

जलता रहूँगा ता ब सहर मैं भी तेरे साथ
करता   रहा   चिराग़  इशारात  रात भर

नबीना मुंसिफ़ी है कि मुंसिफ़ भी है ख़ुदा
मन  में  थी शबे  फैसला ये बात रात भर

अम्नो अमान  ले  के ख़ुदा आये सुब्हे नौ
करता  रहा  फ़कीर  मुनाजात  रात  भर

देते  रहे  वो  दिन  में  भरोसा अमान का
करते रहे जो ख़ुद ही फसादात रात भर

जाये  शबे  ज़िफ़ाफ़  हुई  नौ  उरुस  की
की  दोस्तों  ने  ऐसी  मुदारात  रात  भर

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