कब तक हमें नसीब सँभालेगा बोलिये

कब  तक  हमें  नसीब  सँभालेगा बोलिये
जब हमने पाल रक्खे हैं खुद ही सँपोलिये

जन्नत कहा किये थे ज़मीं की जिसे, उसी-
जन्नत के लोग आज जहन्नुम के हो लिए

मंज़ूर  था  नहीं  कि रुके कारवाँ की चाल
खुद आबलों में हमने ही काँटे चुभो लिये

करते  रहे  थे  मेरा  मुदावा  जो आज तक
पढ़ कर वसीयत अब वही बीमार हो लिये

देते  नहीं  हैं  आप  मुआफ़ी  किसी  को भी
अपनी ख़ताओं पर भी कभी कुछ तो बोलिये

ख़्वाबों में आसमान की कब तक करेंगे सैर
लाज़िम  है आप अपने  परों को भी तोलिये

लश्कर  की  मेरे  करते  रहे  रहनुमाई जो
मैदाने  जंग  में  वही  दुश्मन  के  हो  लिये

रौशन  हैं  आपके  ही  लिए  महफ़िलें  तमाम
किस्मत का कुफ़्ल आप किसी का तो खोलिये

शमसान   सा   सुकूत   नहीं   चाहिए   मुझे
बेहतर  है  आप  लोग  जो  चाहें  वो बोलिये

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