ज़ख़्म दिल का कहीं न भर जाये

ज़ख़्म दिल का कहीं न भर जाये
और   तू   ज़ेह्न   से  उतर जाये

आ   बढ़ा   दे   मेरी   परेशानी
रायगाँ   क्यूँ   तेरा  हुनर जाये

दावते दिल है आ मकीं हो जा
क़ब्ल इसके कि ये मुकर जाये

तू जो पिघले तो मैं बहूँ जी भर
और  दरिया  चढ़ा  उतर  जाये

मर ही जाता है आँखों का पानी
ज़ह्रे नफ़रत जब इनमें भर जाये

फिक्र रख़्ते सफ़र की क्या करना
मंज़िले  हद  को जब बशर जाये

तेरी तल्ख़ी की लत लगी है जब
क्यूँ  मैं  चाहूँ  कि  तू सुधर जाये

हर  नफ़स  में हो तेरी वो खुशबू
नब्ज़  जिसके  लिये  ठहर  जाये

ऐसे  हालात  भी  जिये  हमने
और  कोई  जिये  तो मर जाये

रख़्ते सफ़र --- यात्रा का सामान
मंज़िले हद  -- अंतिम पड़ाव
नफ़स --- सांस

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