इश्क जेरे समंदर नदी की तरह
इश्क जेरे समंदर नदी की तरह
चाँद के साथ है चाँदनी की तरह
ख्वाहिशों का जहां में कहाँ अंत है
ये हैं सहराओं में तिश्नगी की तरह
नेमतें नेक इन्सां को मिलती ही हैं
बंदगी हो अगर बंदगी की तरह
मौत का दिन है तय तो मरें रोज क्यूँ
ज़िंदगी को जियें ज़िंदगी की तरह
दोस्तों से कभी कुछ छिपाओ नही
बात कह दो, भले दिल्लगी की तरह
रूह की ताब जब हो नुमाया तो फिर
तीरगी भी दिखे रोशनी की तरह
ख़ैर मकदम करूँगा तुम्हारा मगर
शर्त ये है कि आओ सफ़ी की तरह
फ़र्ज़ को बोझ कहना मुनासिब नहीं
ये इबादत की है पेशगी की तरह
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