दुश्मनी रहती है छुपकर दोस्ती के साथ साथ
दुश्मनी रहती है छुपकर दोस्ती के साथ साथ
ये बढ़ी है बेयक़ीनी बेहिसी के साथ साथ
कौन है अपना बस इतना जानने के वास्ते
दूर तक चलना पड़ा है ज़िन्दगी के साथ साथ
चश्मेबातिन वो अता कर दे ख़ुदा जिससे कि हम
देख लें इंसान को भी आदमी के साथ साथ
जिसको देखा भी नहीं उस पर भरोसा क्यूँ करें
दो क़दम भी क्यूँ चलें हम अजनबी के साथ साथ
ख़्वाहिशें अपनी बढ़ाना क्यूँ समुंदर की तरह
तिश्नगी बढ़ती है जिसकी हर नदी के साथ साथ
ख़ालिक़े-कौनो-मकां हमको बता इसका सबब
अश्क़ क्यूँ देता है आँखों में खुशी के साथ साथ
हम तो जीने का सलीक़ा सीखने में रह गए
इल्म तो हासिल हुआ पर बेख़ुदी के साथ साथ
हम झुकेंगे आप भी थोड़ा अगर ऊपर उठें
ख़ूबियाँ और ख़ामियाँ तो हैं सभी के साथ साथ
ज़िन्दगी जो 'शेष' है वो चैन से कट जाएगी
हम रहेंगे बज़्मआरा शायरी के साथ साथ
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