सहरा की ज़िद ही इतनी तूफानी थी
सहरा की ज़िद ही इतनी तूफानी थी
गिर्द सराबों की बस्ती बस जानी थी
दिन भर धूप जहाँ थी सोये वहीं मगर
डूबे सूरज से गर्मी कब आनी थी
सोच रहा था वो भी बुत बन जायेगा
पत्थर की ख़्वाहिश में बेईमानी थी
सूखा दरिया भी एहसास कराता है
उसमें भी इक दिन भरपूर रवानी थी
मैं मजबूर समुन्दर लेकर क्या करता
जब मीठे दरिया से प्यास बुझानी थी
मैंने अपनों को सचमुच अपना माना
अब लगता है वो मेरी नादानी थी
उरियानी ने सब वो दाग़ किये ज़ाहिर
जिनके पीछे लिक्खी एक कहानी थी
मेरी जानिब देखा, रंग पड़ा नीला
आसमान की रंगत पहले धानी थी
दिन भर अँधियारे पर हावी था सूरज
आख़िरकार उसे तो मुँह की खानी थी
कैसे समझूँ तू ग़मगीं था या ख़ुश था
तेरी हँसती आँखों में तुगियानी थी
Comments
Post a Comment