बोल कैसे मुझे बर्बाद करेगी दुनिया

बोल   कैसे   मुझे   बर्बाद   करेगी  दुनिया
तू  ही  ग़म  से मुझे आबाद करेगी दुनिया!

जब  अँधेरों ने उजालों  से बग़ावत कर दी
कैसे  दिन-रात  की  इमदाद करेगी दुनिया

इक मुसाफ़िर की तरह आये हैं सब जाने को
कैसे   मेहमान  को  नाशाद   करेगी  दुनिया

रूठ कर, इसको किसी दिन मैं चला जाऊँगा
बाद   जाने  के   बहुत   याद   करेगी  दुनिया

ख़ुद ही ज़िंदाँ से निकलने को परीशां है  जो
कैसे  हमको  भला आज़ाद   करेगी  दुनिया

रायगां  होगी  मेरी  कोशिशे   परवाज़  मगर
मेरे   उनवान   को   रूदाद   करेगी   दुनिया

मुझको घुट घुट के भी मर मर के जिये जाना है
मेरी   इमदाद   मेरे   बाद   करेगी   दुनिया

रोने धोने से किसी को न हुआ कुछ हासिल
शादमानी  को  ही  बुनियाद  करेगी  दुनिया

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