काँपती है लौ उसकी, ख़ौफ़  तीरगी का है

काँपती है लौ उसकी, ख़ौफ़  तीरगी का है
या चराग़ खुद  अपनी, रौशनी  पे  शैदा है

एक  नाव  पर  मैंने, जब  से  पाँव  रक्खा  है
पार  हो  ही  जाऊँगा, अब  मुझे  भरोसा  है

नब्ज़ भी तड़पती है, जब भी दिल धड़कता है
दरमियान  दोनों  के, ज़िन्दगी  का  रिश्ता  है

प्यार की नुमाइश का, ये भी ढब निराला है
आपका  ख़फ़ा  होना , ख़ामुशी से अच्छा है

ख़्वाब  तो हजारों  हैं, पर  नहीं  हैं  ताबीरें
फिर भी नींद का मेरी, ख़्वाब से ही रिश्ता है

गुम  कहीं न  हो  जाये, फ़िक्र  है उसे अपनी
इसलिए  मेरा   साया,   साथ  मेरे  रहता  है

जाने  कैसी  मज़बूरी,  ढो  रहा  है  हर  इंसां
दिल  भले  रहे  रोता, ज़ाहिरन  वो हँसता है

लाख  ज़ख़्म  खाकर  भी, दर्द इसे नहीं होता
आपने  मेरे  दिल  को, इस  तरह सम्हाला है

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