मेरी आँखों को तू ये बद्दुआ दे
मेरी आँखों को तू ये बद्दुआ दे
कि तेरी दीद के छोड़ें इरादे
हरे रखने हैं मुझको ज़ख़्म अपने
सितमगर को ये कोई इत्तिला दे
मरज़ तू है तो वज्हे मौत बन जा
दवा है तो असर कुछ तो दिखा दे
हटा दे बोझ तू सीने से अपने
हमारे राज़ दुनिया को बता दे
यक़ीं कैसे नहीं करता मैं तुझपर
बज़ाहिर नेक थे तेरे इरादे
हक़ीक़त है वही जो सामने है
फ़साने चाहे तू जितने सुना दे
ख़तायें कर ले तू तस्लीम अपनी
तो शायद ज़िंदगी फिर मुस्करा दे
मैं खुश रहकर बहुत उकता गया हूँ
ख़फ़ा होने का कोई मुद्दआ दे
धड़कने से इसे फुरसत कहाँ है
फ़िदा तुझपर है दिल, कैसे बता दे
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