ज़िन्दगी से तेरी जब कह दे निकल जाऊँगा
ज़िन्दगी से तेरी जब कह दे निकल जाऊँगा
कोई बच्चा तो नहीं हूँ कि मचल जाऊँगा
वक़्त! क्या मैं हूँ खिलौना कि तू खेले मुझसे
तू जो बदलेगा, तेरे साथ बदल जाऊँगा
आज हँस लेने दे पहलू में मुझे तू अपने
सब को रोते हुए मैं छोड़ के कल जाऊँगा
लाख दुनिया ने सताया है रुलाया है मुझे
तू ज़रा हँस के दिखा दे तो बहल जाऊँगा
मेरे चेहरे को हथेली में कभी लेकर देख
मैं तेरे लम्स की गर्मी से पिघल जाऊँगा
नाम दुनिया में अमर होगा यक़ीनन अपना
कर के ता'मीर मैं फ़ैज़ान-महल जाऊँगा
मुझको मालूम है दुनिया! मेरे आने का सबब
मशवरों पर मैं तेरे कर के अमल जाऊँगा
दीनो मज़हब को समझना है मुझे रब से ही
हाथ में ले के मैं क़ुरआनो - रहल जाऊँगा
फ़ैज़ान यश, कीर्ति
अज़ल अनादिकाल
रहल pious book's stand
लम्स स्पर्श
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