तू जो दिखलाई पड़े तो सुब्ह वर्ना शाम है
तू जो दिखलाई पड़े तो सुब्ह वर्ना शाम है
मेरी बीनाई को शायद ये तेरा इन'आम है
तेरे नक़्शे पा पे चलने के लिए मजबूर हूँ
मक़सदे आवारगी भी आज ज़ेरे दाम है
ढूँढता हूँ मैं तेरा चेहरा वही हर इक जगह
जो तसव्वुर में मुसव्वर सूरते गुलफ़ाम है
मौत ही जब ज़िन्दगी की आख़िरी मंज़िल है तो
क्यूँ क़ज़ा हर इक बशर की बाइसे कुहराम है
ज़िन्दगी तू सौ जतन कर ले मगर सच है यही
बंद कर पाना दहानए मौत, मुश्किल काम है
राह में काँटे बिछाने के लिये जी शुक्रिया
पाँव के छालों को मेरे अब बहुत आराम है
आरज़ूओं के कँवल खिलते ही क्यूँ मुरझा गये
दिल के दरिया पर मेरे आइद यही इल्ज़ाम है
क्यूँ नहीं करता शिकायत बादलों से भी कोई
हर जगह सूखी नदी का तज़किरा ही आम है
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