हवा आज इसलिए शायद ज़ियादा हमको भाती है

हवा आज इसलिए शायद ज़ियादा हमको भाती है
तेरी पलकों पे ठहरे अश्क सारे पी के आती है

नहीं पाती है जब आकाश को परवाज़ क़े काबिल
तो चिड़िया खुद ब खुद पिंजरे में आकर बैठ जाती है

तडपता जिस्म मेरा काश शीशे का बना होता
उसे मालूम हो जाता वो कैसे दिल जलाती है

हमारे दर्द को कोई समझ ले ये है नामुमकिन
कोई भी आँख छाले रूह के कब देख पाती है

किसी के इस गुमां पर आज मन ही मन मैं हँसता हूँ
"कि मैं दिन रात रोता हूँ", "कि उसकी याद आती है"

तपिश चाहत में हो औ सोज हो ज़ज्बात में पैहम
तो ज़िद की बर्फ धीरे ही सही पर गल तो जाती है

किसी भी राह को चुनिए अगर ईमानदारी से
तो हर रस्ते पे चलकर मंज़िले-मक़सूद आती है

ख़ुदा तू ही बता किस नाम से तुझको पुकारूं मैं
तेरे बन्दों को समझाने में मुश्किल पेश आती है

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