आज मैं अपने हृदय की वेदना को शब्द देने पर तुला हूँ

आज मैं अपने हृदय की वेदना को शब्द देने पर तुला हूँ
देखना है यह मुझे, मुझमे बची है शक्ति या में थक गया हूँ

मौन का पोषण नहीं अब कर सकूँगा, मैं मुखर होकर कहूँगा
मैं स्वयं प्रत्येक शुभ गंतब्य का अब पथ-प्रदर्शक बन गया हूँ

दृष्टि से ओझल सभी के है स्वयं ईश्वर, कभी देखा किसी ने
नेत्र अपने मूँद कर मैं तो उसे, केवल उसे ही देखता हूँ

दे रहा हूँ आजकल परिचय स्वयं अपना स्वयं को, सज्ज होकर
सूक्ष्म सा परमात्मा का अंश मुझमे है निहित, समझा चुका हूँ

दृष्टि बाधित हो रही थी, कल्पना के दृश्य सम्मुख आ रहे थे
इसलिए मैं कल्पना के पार की परिकल्पना करने लगा हूँ

एक मुँह देकर दिए हैं कान तुमने दो सभी को,क्यों विधाता ?
बुद्धि मुझमें है नही लेकिन कदाचित मर्म इसका जानता हूँ

लोग अपने आप पर ही हँस रहे हैं,कुछ किया तूने यथोचित
वास्तविकता से उन्हें परिचित कराया है यही मैं सोचता हूँ

शेषधर जी! आप भी आराम थोड़ा कर लिया करिये कभी तो
लीजिये विश्राम अब मैं आपके मंथर हृदय को दे रहा हूँ

शेषधर तिवारी
9935214849
इलाहाबाद
27 09 2017

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