चाँद को अपना मुखड़ा दिखा दीजिये
चाँद को अपना मुखड़ा दिखा दीजिये
उसको औक़ात उसकी बता दीजिये
रात भर के लिये ये सज़ा कम नहीं
दिन ढले देखकर मुस्करा दीजिये
ख़्वाब में भी न देखें किसी और को
मेरी आँखों को ये बद्दुआ दीजिये
मेरे दिल ने गवाही सरे आम दी
फैसला जो भी हो, अब सुना दीजिये
ऐसी बादे सबा में भी सूखे हैं लब
बढ़ न जाये मरज़ कुछ दवा दीजिये
मौत पाकर तो आज़ाद हो जाऊँगा
आप जीने की मुझको सज़ा दीजिये
बन तो जाऊँ मैं दरिया मगर शर्त है
आप ख़ुद को समुन्दर बना दीजिये
छत पे कब से है तनहा बिछी चाँदनी
उसको ज़ीने का रस्ता बता दीजिए
शायरी में बयां मत करें हाले-दिल
सिर्फ नज़रों से नज़रें मिला दीजिये
राख वैसे भी होना ही है एक दिन
मुझको लोबान करके जला दीजिये
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