वादे पे मेरे इतना उसे ऐतबार हो

वादे  पे  मेरे  इतना  उसे  ऐतबार  हो
मैं  भूल जाऊँ  तो भी उसे इंतज़ार हो

लगता है ज़िन्दगी में बचा ही नहीं है कुछ
दो चार दिन जो यार से कोई न रार हो

ऐसे  कटेगी  कैसे  भला  ज़िन्दगी  मेरी
जब तक नसीब में न कोई गुल या ख़ार हो

मुझको  हसीं  गुनाह  की  तौफ़ीक़ ऐसी दे
मुन्सिफ़ जो दे सज़ा तो वो भी ज़ार ज़ार हो

मैं एहतराम कैसे करूँ उस रफ़ीक़ का
मेरी ख़ुशी को देख के जो सोगवार हो

रोना था जब तो जो न हुआ आबदीदा भी
इम्कान कैसे हो कि वही  ग़मगुसार  हो

मुमकिन इसे करूँ तो भला कैसे मैं करूँ
वो हार  कर भी जीते, मेरी जीत हार हो

इक शक्ल मुझको दे तो दिया तूने कूजागर
लेकिन  ये  देख  लेना  न  कोई  दरार  हो

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