न  जाने  दिल में  बसी इतनी बेकली क्यूँ है

न  जाने  दिल में  बसी इतनी बेकली क्यूँ है
जो  जान  ले  ले  वही  मेरी ज़िंदगी क्यूँ है

'हवा के दम' से ही जिंदा है लौ चिरागों की
फिर उसकी जलते चिराग़ों से दुश्मनी क्यूँ है

चिराग़ शब ने जलाया है शम्स की ख़ातिर
अंधेरी  रात  के  पहलू  में  रोशनी क्यूँ है

जो माहताब की आमद से चाँदनी खुश थी
सहर  हुई  तो ज़मीन  ऐसी शबनमी क्यूँ है

जो दम पे ज़ेहन के आबाद शह्र हैं सारे
तो ज़हने शहर में आबाद मुफ़लिसी क्यूँ है

मेरा  उसूल  है,  मैं  सच  के  साथ रहता हूँ
मुझे  इसी  की  सज़ा  बारहा  मिली  क्यूँ  है

मयस्सर आबो हवा है जो दम पे क़ुदरत के
तो उस के वास्ते हम में  ये  बेहिसी  क्यूँ  है

चढ़ा था तू भी अना के पहाड़ पर लेकिन
उतरते वक़्त ये पैरों में कँपकँपी क्यूँ है

किया है प्यार से जिसने भी प्यार दुनिया में
बता नसीब में उसके ही ख़ुदकुशी क्यूँ है

बिताई रात ख़ुशी से जो चाँदनी के साथ
उनींदे  चाँद  के  चेहरे  पे  बेरुखी क्यूँ है

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